खेती, पशुपालन व हॉर्टिकल्चर हमारी अर्थव्यवस्था के स्तम्भ

  • पुष्पेश त्रिपाठी

यह बसभीड़ा, चौखुटिया विकासखंड के आम और लीची के बागान हैं। किसी समय में जब तराई छेत्रों (जुलाई-अगस्त) में जब आम का सीजन खत्म हो जाता था, तब मुरादाबाद से लोग यहां आम की फसल खरीदने आते थे। यह आम जो देर में पकता है, उसका आनंद लोग सितंबर, अक्टूबर तक लेते थे।

बगीचों की बुकिंग महीनों पहले से हो जाती थी। धीरे-धीरे सब खत्म हो गया। खेती, पशुपालन व हॉर्टिकल्चर हमारी अर्थव्यवस्था के स्तम्भ हैं, वह धीरे धीरे जंगली जानवरों के कहर से खत्म होते जा रहे हैं। सुअर व बंदरों की संख्या पहाड़ों में बढ़ती चली जा रही है, जो फसल की बर्बादी के लिए जिम्मेदार हैं। लोग साड़ियों, स्पीकरों का इस्तेमाल कर, फसल को बचाने की कोशिश कर रहे हैं पर सब व्यर्थ है। सरकार हज़ारों करोड़ रुपयों की स्कीम्स और पैकेज घोषित करती हैं।

इतनी बड़ी रकम होने के बावजूद इसका एक प्रतिशत असर ज़मीन पर नही दिखता है। ऊपर से हालात बद से बदतर हो रहे हैं। ज़रूरी कृषि, हॉर्टिकल्चर और आर्थिक नीति का अभाव है कि हज़ारों करोड़ रुपये, बीच में ही गायब हो जाते है। सरकारों की योग्यता नही है कि वो काम करें, और फंड्स का सही उपयोग करें। साथ ही लोगों ने छोटी उलझनों में फसकर इन सब चीज़ों के बारे में सवाल करना छोड़ दिया है। हमारे, उक्रांद के 1994 के घोषणा पत्र में हमने 5000  करोड़ रुपए की एग्रीकल्चरल इकॉनमी की बात कही थी, तब यह माना जा रहा था कि उत्तराखंड कृषि के मामले में स्वयं पर निर्भर होने वाला राज्य होगा। पर समय के साथ आगे बढ़ने की बजाय हम बहुत पीछे आ गए हैं।

आज गेहूं की छटाई के लिए शायद कम ही लोग बैलों का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि ज्यादातर लोग खेती करना छोड़ चुके हैं। कुछ लोग ट्रैक्टर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं और सरकार इनमें सब्सिडी भी दे रही है, पर ट्रेक्टर के लिए सब्सिडी का क्या फायदा जब फसल ही नही है। सुनने में सुअर, बंदरों का मुद्दा छोटा लगता है पर हर एक किसान इसका दर्द समझता है। आज हमारे राज्य में इनकम जनरेशन का कोई पुख्ता साधन नही है। जहाँ सरकारों ने लोगों को सशक्त कर के उन्हें आत्मनिर्भर बनाना चाहिए था, आज वे सब बेरोजगारी, पलायन के लिए विवश हैं। और आज 20 वर्षों के बाद भी हमारी सरकार हर चीज़ के लिए केंद्र पर निर्भर है। सरकारें मौन हैं क्योंकि उनकी नीयत नही है। सरकार से आग्रह है कि बड़ी-बड़ी घोषणाओं के साथ नीतियों पर भी काम हो ताकि उनका लाभ ज़मीनी स्तर पर दिख सके।